शनिवार 5 सितंबर 2026 - 00:04
इसराफ़ और तबज़ीर से बचना और संतुलित जीवन अपनाना ज़रूरी: मौलाना मोहसिन तक़वी

नई दिल्ली, जामा मस्जिद कश्मीरी गेट मे 4 सितम्बर 2026 को नमाज़ ए जुमा अदी की गई, जिसकी इमामत हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन सय्यद मोहसिन तक़वी , जामेअतुश शहीद के प्रधानाध्यापक ने की।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, जामा मस्जिद कश्मीरी गेट, दिल्ली में ख़ुत्बा-ए-जुमा के दौरान मौलाना मोहसिन तक़वी ने इसराफ़ और तबज़ीर से बचने तथा जीवन मे संतुलन अपनाने पर ज़ोर देते हुए कहा कि इंसान को अपने माल को अनुचित और गैर-ज़रूरी स्थानों पर खर्च करने से बचना चाहिए।

उन्होंने अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली (अ) की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस व्यक्ति के पास माल हो, उसे उसकी हिफ़ाज़त करनी चाहिए और उसे बरबाद नहीं करना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति अपने माल को ऐसी जगह खर्च करता है जहाँ खर्च करना उचित नहीं है तो यह इसराफ़ और तबज़ीर की श्रेणी में आता है।

मौलाना मोहसिन तक़वी ने कहा कि इसराफ़ और तबज़ीर मे अंतर है। इसराफ़ का अर्थ हद से आगे बढ़कर खर्च करना है, जबकि तबज़ीर का अर्थ माल को ऐसी जगह खर्च करना है जहाँ उसका खर्च किया जाना ही उचित न हो। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि शादी में आवश्यकता से अधिक खर्च करना इसराफ़ हो सकता है, जबकि किसी अनुचित या शरीयत-विरोधी काम में धन खर्च करना तबज़ीर के अंतर्गत आता है।

उन्होंने कहा कि आज समाज में दिखावे के लिए होने वाला अत्यधिक खर्च एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। आलीशान शादी, महंगी सजावट और अनावश्यक खर्च से लोगों के बीच कुछ समय के लिए चर्चा तो पैदा हो सकती है, लेकिन यह चर्चा जल्द ही समाप्त हो जाती है। इसके विपरीत, व्यक्ति का आर्थिक नुकसान लंबे समय तक बना रहता है।

मौलाना ने कहा कि इसराफ़ का नुकसान केवल आर्थिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक भी है। इंसान जब अपना धन अनावश्यक कार्यों में खर्च कर देता है तो वास्तविक जरूरतों, परिवार की जिम्मेदारियों और नेक कार्यों के लिए उसके पास पर्याप्त साधन नहीं बचते। उन्होंने कहा कि माल मे बरकत भी इंसान के सही इस्तेमाल और संतुलित खर्च से जुड़ी है।

उन्होंने फ़ुज़ूलखर्ची करने वाले व्यक्ति की कुछ निशानियों का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल लोगों की प्रशंसा और दिखावे के लिए खर्च करना बातिल फ़ख्र है। इसके अलावा, जब व्यक्ति अपने माल में गरीबों, जरूरतमंदों और रिश्तेदारों के अधिकारों को नज़रअंदाज़ कर देता है और दूसरी ओर गैर-ज़रूरी कार्यों में धन खर्च करता है, तो यह भी गंभीर समस्या है।

मौलाना मोहसिन तक़वी ने कहा कि इंसान को उन धार्मिक शिक्षाओं को ही स्वीकार नहीं करना चाहिए जिनमें उसका अपना लाभ दिखाई देता है, बल्कि दीन और शरीयत के सभी आदेशो को समान रूप से स्वीकार करना चाहिए उन्होंने कहा कि हमें अपनी पसंद और व्यक्तिगत लाभ के आधार पर धार्मिक अहकाम का चयन नहीं करना चाहिए।

उन्होंने नेक कामों में भी संतुलन की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि सख़ावत का अर्थ यह नहीं कि इंसान अपनी सभी संपत्ति किसी को दे दे और अपनी तथा अपने परिवार की आवश्यक जिम्मेदारियों को भूल जाए। इंसान को अपनी आय और परिस्थितियों के अनुसार खर्च करना चाहिए।

मौलाना ने कहा कि जीवन में खर्च की प्राथमिकता तय करना भी आवश्यक है। बच्चों की शिक्षा, परिवार की आवश्यक जरूरतों और जरूरी खर्चों को केवल दिखावे के लिए आयोजित होने वाली महंगी दावतों और समारोहों पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

उन्होंने समाज में किताबो और ज्ञान पर घटते खर्च पर भी चिंता व्यक्त की और कहा कि एक ज्ञान-प्रेमी समाज वही होता है जो दिखावे की वस्तुओं के बजाय शिक्षा और किताबों को महत्व देता है। हमें यह विचार करना चाहिए कि हमारा पैसा किन चीज़ों पर खर्च हो रहा है और क्या उसमें ज्ञान, शिक्षा तथा समाज की भलाई के लिए भी हिस्सा रखा जा रहा है।

क़ुरआन की आयत «إِنَّ الْمُبَذِّرِينَ كَانُوا إِخْوَانَ الشَّيَاطِينِ» का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि फ़ुज़ूलखर्ची करने वालों को क़ुरआन ने शैतानों का भाई बताया है। इसलिए मुसलमान को अपने माल के इस्तेमाल में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

मौलाना मोहसिन तक़वी ने कहा कि न कंजूसी सही है और न फ़ुज़ूलखर्ची, इस्लाम इंसान को संतुलित और मध्यम मार्ग अपनाने की शिक्षा देता है। हमें लोगों की अस्थायी प्रशंसा के लिए धन खर्च करने के बजाय अल्लाह की रज़ा, परिवार की आवश्यकताओं, जरूरतमंदों की सहायता, शिक्षा और समाज की भलाई को प्राथमिकता देनी चाहिए।

अंत में उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला सभी को इसराफ़ और तबज़ीर से बचने, माल में बरकत पाने और क़ुरआन व अहलेबैत (अ) की शिक्षाओं पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

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